Wednesday, September 14, 2011

बदलता सा समय

समय ये भी अलबेला है
जाने खेल  कैसे खेला है |

कभी बह गया ये आँखों से पानी बन कर
कभी छलक गया ये अधरों पर  मुस्कान बन कर |

कभी वो काले मेघ जो गम के थे
बरस गए दरिया जहा सुख का था |

कभी एक झीनी सी उम्मीद की किरण से
सूख गया वो दलदल जो दुःख  का था |

कभी सपने जो शीशे से साफ़ थे
धुंदला दिए वो बदलाव के थपेड़ो ने |

कभी अभिलाषाए जो गुमसुम सी थी
चहक उठी एक पल से ही |

समय  ये भी अलबेला है
जाने खेल कैसे खेला है |





2 comments: