Sunday, June 26, 2011

....

जीवन के उतार चड़ाव में
खोए हुए रास्तो की तलाश में
सामने खड़ी मंजिल से तुम मिल नहीं पाए.

बहे हुए अश्रु  की परिकल्पना  में
ग़ुम हुए अपनत्व की  प्रतीक्षा  में
मुस्कुराती हुई ख़ुशी से तुम मिल नहीं पाए

किसी  चिंता में खोकर
व्यथित हृदय से रोकर
उस संतोषी जीवन से तुम मिल नहीं  पाए

सत्य से विमुख हो और
तुम  दुःख  के  समुख हो .

इस  नश्वर  संसार में
तुम खोज रहे अमरत्व  हो .

इस संताप से  हटाव के लिए
तुम अवज्ञा कर रहे उस वरदान की हो .

तुम उपेक्षित हो नहीं
तुम अवहेलना कर रहे संसार की हो .


.









 






Friday, June 17, 2011

पल बीते हुए


जीवन सागर में वो बूँद  बराबर
पल ही तो अनमोल है .
उन मधुर  स्मृतियो में जो सम्मोहन है
वो ही तो बांधे अब  तक  एक डोर है .
वो समय  जो बीत चला
उसमे ही तो सपनो का कोष है .

वो मनोभाव जिन्हें कभी शब्दों
में पिरोने की आवश्यकता न थी.
वो सुन्हेरे एहसास
जिनकी कोई अभिव्याक्ति न थी
और वो  समय से आगे बड़ने की
जब कोई महत्वकान्षा न थी .

उन्ही अमूल्य क्षड़ो  में है जैवज्योति सारी.
और उन्ही पलो में बिखरी  है मुस्कान सारी.











Thursday, February 25, 2010

परिवर्तन

जीवन रूपी पौधे के

लिए नीर हूँ मैं ।

धूप में चलते पथिक के

लिए छाँव हूँ मैं ।

अनिवार्य हूँ सफलता के लिए

पर कभी संगी हूँ दुःख का भी ।

मैं परिवर्तन हूँ।

मेरी अनुपस्थिति से

भावशून्य है जग सारा ।

मैं कारण हूँ चिंता का

तो कभी प्रेरणा हूँ श्रम की।

मुझसे अस्तित्व है

सुख का भी और दुःख का भी ।

शक्ति हूँ आशा को निराशा में,

पराजय को विजय में परिवर्तित करने की ।

और विवशता हूँ स्वत: को

ही परिवर्तित न कर सकने की ।

मैं विरोधी हूँ स्थिरता का

पर मैं स्वयं ही स्थिर हूँ।

मैं परिवर्तन हूँ ।

Tuesday, February 16, 2010

"मेरा जीवन एक सपाट ,समतल मैदान है, जिसमे कही-कही गड्ढे तो हैं,पर टीलों,पर्वतो ,घने जंगलो ,गहरी घाटियो और खंडहरों का स्थान नहीं है । जो सज्जन पहाड़ो की सैर के शौक़ीन है ,उन्हें तो यहाँ निराशा ही होगी ।
"

प्रेमचंद

Monday, November 16, 2009

अभिलाषा

जो स्वयं से ही अज्ञात है ।
जो खोया है अपने ही उन्माद में ।
जो उड़ रहा है अपने ही स्वपन के आकाश में ।
जो शांत है चद्रमा सा कभी ।
तो चचल है लहरों सा कभी ।
जो आहत है तीक्षण शब्दों से ।
तो प्रफुल्लित है एक मीठी वाड़ी से ।
मै अभिलाषा हू उस मन की ।


मैं अभिलाषा हूँ एक कराहती हुई वृक्ष की डाली
को पुनः प्रवर्तन करने की ।
मैं अभिलाषा हू उन बिखरते हुए मोतियो को
एक माला में पिरोने की ।
मै अभिलाषा हू शोकार्त जीवन में रस भरने की।
मैं अभिलाषा हूँ जनजीवन की खुशहाली की।
मैं अभिलाषा हूँ परिवर्तन को समझने की।


मैं दूर हूँ आडम्बर से ,स्वार्थ से, कृत्रिमता से।
मैं स्वछन्द हूँ,निर्भय हूँ ,अपरिमित हूँ।
मैं स्वच्छ हूँ ,निर्मल हूँ,निष्कपट हूँ।


मैं अभिलाषा हूँ एक मन की जो
अनभिज्ञ है की मैं अभिन्न हूँ उस मन से ।

Sunday, September 6, 2009

FAMOUS QUOTES ON INDIA (by non indians)

Albert Einstein said: We owe a lot to the Indians, who taught us how to count,
without which no worthwhile scientific discovery could have been made. ·

Mark Twain said: India is, the cradle of the human race, the birthplace of human
speech, the mother of history, the grandmother of legend, and the great grand mother
of tradition. Our most valuable and most instructive materials in the history of man are treasured up in India only. ·

French scholar Romain Rolland said: If there is one place on the face of earth where all
the dreams of living men have found a home from the very earliest days when man
began the dream of existence, it is India. ·

Hu Shih, former Ambassador of China to USA said: India conquered and dominated China culturally for 20 centuries without ever having to send a single soldier across her border.

forwarded by Sulabh Kothari

Saturday, July 18, 2009

किनारा

मैं एक किनारा हूँ ,गंगा नदी का किनारामेरे ही ह्रदय को छू कर

तुम इस तरंगिनी को नमस्कार करते होमैं कही त्रिवेणी घाट हूँ ,

कहीं तुलसी घाट तो कहीं सिर्फ़ एक किनारामैं कहीं पूजनीय

हूँ तो कहीं उपेक्षित .मैं कही घिर गया हूँ श्रधालुओ की भीड़ से तो

कहीं खो गया हूँ सन्नाटे मेंमैं सहचर हूँ मन्दाकिनी का गोमुख

से बंगाल की खड़ी तक कासुरसरिता जब पूरे वेग से बहती है

तो मैं समां जाता हूँ इसी तटिनी मेंमैं भागिरिथी को तब से

जानता हूँ जब इसका जल व्योम सा नीला होता थासूर्य की

पहली किरण जब इस जलमाला पर पड़ती तो वातावरण

अभिमंत्रित हो जातानभचर भी इस बेला पर जैसे नाच उठते

मैंने देखा हैं गंगा की शान्ति को, गंगा की क्रिदाओ को और गंगा के

रुदन को भीमैंने देखा हैं मनुष्यो को गंगा के प्रकोप से काल का

ग्रास बनते हुएमैं साक्षी हूँ उनकी मृत्यु का पर दोषी नहीं

प्रतिदिन देखता हूँ हजारो लोग आते हैं देवनदी के दर्शन को, कुछ

जीवन का अनुष्ठान करने तो कुछ किसी आत्मा को विदा करने

यहाँ आने वाले गंगा की पूजा करते हैं ,गंगा को माँतुल्य कहते हैं

गंगा सब को आशीर्वाद देती हैं पर मैं रोते हूँ जब इन बच्चो को

अपनी ही माँ को दूषित करते देखता हूँतुम मेरे आंसू नहीं देख

सकते वो सम्मिलित हो जाते है गंगा में हीतुम मेरा दुःख नहीं

समझ सकते वो खो जाता है गंगा के प्रवाह में कहीं और मैं रह

जाता हूँ अनदेखा, अनसुना


मैं एक किनारा हूँ गंगा नदी का किनारा