Wednesday, April 15, 2015

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बुद्धिबल अगर चाहिए
तो समझो एक उपाय
बुद्धि है तलवार सी
घिसे बार बार तो हुए तेज़ है धार।
जो जाननी है इच्छाशक्ति
तो देखो नदी का बहाव
चीर चट्टान जो है चली
अपने लक्ष्य की ओर।
जो हो जाओ लाचार
तो चलो चील की चाल
अपने पुनःजीवन के लिए
जो करे घोर संघर्ष।
चलो चील की चाल
और जीतो पूरा संसार। 

Friday, April 10, 2015

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लकीरो से तो केवल धरती बटी है
आकाश भी कभी किसी सीमा में बंधा है
सम्भावनाओ के भंवर में तो केवल मस्तिष्क फसा  है
मन की आकांक्षाओं को कुछ सुध ही कहा है
कदमो ने तो केवल रास्ता मापा है
आसमान की उड़ान की कोई हद ही कहा है
आशंकाओ ने तो केवल वास्तविकता को जकड़ा है
सपनो पर कोई पाबन्दी कहा है ।



Wednesday, February 25, 2015

किस्से

किस्से जो कहानियो में मजा देते है
ध्यान से देखा तो सबके जीवन में ही गूंजते है 
बेशक पिरोता नहीं है उन्हें हर कोई कहानिओं में 
पर जीता है उन्हें हमेशा अपनी तन्हाईओं में 
लच्छेदार सी बातों में वो रोचक से किस्से 
कभी हंसी के तो कभी आंसुओ के किस्से 
है बड़े रसीले सभी ये किस्से
नहीं मिलेंगे किसी किताब में जो 
वो है तेरे मेरे जीवन के किस्से  । 









Monday, February 9, 2015

राजनीति का नया दौर

जो नहीं है दिल्ली में
वो भी जीत का आनंद जताए 
राजनीति का यह अलग अध्याय है 
परिवर्तन ही अब हर जगह स्थायी है 
कुछ ऐसी है बाजी पलटी 
मई में जिनकी अदभूत जीत थी 
अब शर्मसार उनकी हार है 
बदलाव ही आम आदमी की गुहार है
क्यूंकि आम आदमी को अब इस व्यवस्था से इंकार है




Wednesday, February 4, 2015

मेरी पहली बर्फ़बारी

         
         
 धरती ने पहना आज सफ़ेद चोगा है 
 हर ओर प्रकृति की कला का दिव्य नज़ारा है 
 बर्फ के इस आवरण में पर्यावरण और भी मनोहर है 
 सौम्यता की बेला में सुंदरता बिखरी हर दृश्य में है 
 सफ़ेद वस्त्रो में वृक्ष् भी कैसे इठला रहे है
 सजी है सृष्टि ऐसे जैसे कोई त्यौहार मना रहे है  

 पर यत्र तत्र सर्वत्र 
 सिर्फ बर्फ का ही अस्तित्व है 
 इस लगातार गिरती बर्फ से 
 जनजीवन कुछ तो विचलित है 
 ढूँढ रहा हर जीव अपना ठिकाना है 
 इस सफेदी का साथ जाने कब तक निभाना है 

मंत्रमुग्ध करता है वातावरण 
पर सामान्य जीवन बाधित है 
प्रकृति की यह है कोई पहेली 
या शायद कोई अपनी हंसी ठिठोली है 














Tuesday, December 2, 2014

मंजिल की अगर है पहचान तो
रास्ते भी मिल ही जाएंगे  
हिम्मत बस पहले कदम की चाहिए 
नए अनुभवों में लिपट फिर
नए सीख से महक फिर 
उस लक्ष्य तक की डगर सामने आएगी 
डर का दलदल भी आएगा 
इच्छाशक्ति जिसे पार करेगी 
डगमगाएगा कभी आत्मविशवास तो 
मंजिल की उम्मीद उसे संभालेगी 
सभी मुश्किलो से गुजर जो उभरेगा फिर 
वही एक मुकाम नया पाएगा 
सभी चुनौतियों से लड़ जो संवरेगा फिर 
वही एक उत्कृष्ट जीवन पाएगा ॥ 








Friday, September 12, 2014

बंजारे से जब पूछा

अस्थिरता है जीवन में,बहाव में क्या मज़ा है
दुनिया को खुद में समेटने से क्या मिला है
आकाश में उड़ते पक्षियों को टुकटुकाकर देखने में क्या रखा है
बढ़ते हुए कदमो से तो रुका हुआ रास्ता भला है
नदिया के बहते पानी ने किनारो को भी कभी कुछ दिया है

बंजारे से जब पूछा

चाँदनी रात में घूमने में क्या मज़ा है
सूरज की किरणों से लड़ने से क्या मिला है
सिमटे जीवन को बिखेरने में क्या रखा है
ऐसे जीवन से तो दंड भला है
पंछी की उड़ान ने आसमान को भी कभी कुछ दिया है

बंजारे ने तब बस इतना कहा

ऐसी ज़िन्दगी है मेरी और ज़िन्दगी जीने में सबसे बड़ा मज़ा है