Friday, November 11, 2011

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वो आने वाला पल
जो सदियो सा लम्बा है |
व़ो बीती हुई सदिया
जो पल से भी छोटी है |
क्यूँ प्यारी सी वो
बीती हुई कहानी है |
और क्यूँ अलग सा ये
आगामी सफ़र  है |
क्यूँ भाग रहे पीछे
एक मृगतृष्णा के |
और क्यूँ छोड़ रहे
पीछे वास्तुता को |

Tuesday, November 8, 2011

तो क्या बात हो

कुछ सपने की तरह
गुज़र जाए ये ज़िन्दगी तो क्या बात हो |

कुछ आंसुओ की तरह
बह जाए ये मुश्किले तो क्या बात हो |

पलक झपकते ही बदल
जाए ये कहानी तो क्या बात हो |

मंजिलो के मिलने में खो जाए कही
रास्ते  से  बिछड़ने का गम तो क्या बात हो |

दिल चाहे जो मिल जाए  वही
तो क्या बात हो |

थोड़ी सी खट्टी और बहुत सी मीठी
हो हर ज़िन्दंगानी तो क्या बात हो |




Thursday, October 20, 2011

रंग

जितने रंग है इन्द्रधनुष के
उससे भी ज्यादा रंगों में है इन्सान  यहाँ |

फासला बस एक समझ का है
न कोई सही न कोई गलत यहाँ |

विश्वास जो जीत सके
वही अपना  है यहाँ |

विचारधारा किसी की
कभी मिलती है कहा |

सोच सबकी इतनी
जुदा सी है |

जीने का अंदाज़ भी
इतना नया सा है |

उचित अनुचित
कुछ भी नहीं है यहाँ |

अगर इक दूजे के लिए
दिल में सही है वजह |

Sunday, October 16, 2011

कुछ नई पंक्तिया

1.हर एक गम का किनारा नहीं होता
   हर तरफ ख़ुशी का नज़ारा नहीं होता
   बीत जाए ये लम्हे कुछ ये दुआ है हमारी
   क्यूंकि हर बार वक़्त हमारा नहीं होता


2.जिंदगी ने जिसको जो जमीन बाटी
   उसको वही रास न आई
   जिसका जो सपना था
   वो किसी और ने ही जिया
   राहें तो कभी मेरी भी मुश्किल न थी
   फिर रास्ता तेरा ही क्यूँ हमेशा असान लगा


3.कुछ ख्वाब  जो   पलको की खिड़की से है झांकते
   कुछ सिसकियो  जो आवाज़ का दामन ही नहीं है थामती
   कुछ दायरे जो दायरों में ही नहीं है सिमटते
   कुछ खामोशियाँ जो आइने से  है ताकती




  

Saturday, October 15, 2011

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ये उड़ान आसमान  को छूने की नहीं
अपने पंख फ़ैलाने की एक कोशिश   है
ये बदलाव प्रगति के लिए नहीं
स्थिरता को पाने की एक उम्मीद है
ये दौड़ समय से आगे निकलने की नहीं
समय के बीच  में बहने की एक कामना  है
एक इच्छा है
बिखरे हुए पलो को समेटने की
एक अभिलाषा है
पलको पर रखे हुए सपनो को जीने की
एक आशा है
इन सपनो की उड़ान भरने की






Wednesday, September 28, 2011

सोच की खोज

अपने ही विचारो के  मंथन में
जीवन  को समझने के चिंतन में
एक प्रतिबिम्ब सा दिखा मुझे
हाँ ये  परछाई  है मेरी ही अकांक्षाओ की
एक  गहराई  में उतरना है
जिसकी  सतह भी है अभी अनछुई
इस अथाह महासागर में खोजना है
अपने ही मन  के  रहस्यों  को
एक लहर सी है इन विचारो की
एक उथल पुथल सी है कुछ सवालो की
एक  अंतकर्ण को अब छूना है
अपनी ही सोच को अब समझना है







Monday, September 19, 2011

कुछ बातें जो मन चाहे


ज़िन्दगी के घुमावदार रास्तो में
अब कही खोने का मन करता है|
एक लम्बी सी  सपनो भरी नीद 
अब सोने का मन करता है|
समय के पन्नो को
अब पीछे पलटने का मन करता है|
वो कुछ पुराने दिन
अब  दोबारा  जीने का मन करता है|
इस लम्बे सफ़र में कहीं
अब कुछ देर रुक जाने  का मन करता है |
कुछ अनकही सी बातो को
अब कहने का मन करता है|
इन गुजरतो हुए पलों में
अब कही बहने  का मन करता है|